Friday, June 5, 2009

Exposition of Thought a way to luminosity

Expression of thoughts is the desire of each individual but seldom does one get the vehicle to express it, in the good old days it was expressed in poetry and then the dramatics and then the celluloid. All these though effective mediums but were subject to public recognition and perception which was more often restrictive.

Now all these mediums have surrendered themselves to the entertainment qoutient, which has become the need of the hour, infact the immense commercialization has made it a puppet of the market forces and sensetionalizing is a tool to publicize. But the advent of the internet and blog has created an opportunity which would be the future growth engine for the exposition of thoughts.

It has always taken a revolution to bring about the change in the perception and the traditions and I guess we are in the transitional phase of yet another revolution.

Yet another poem by Dwarika Prasad Maheshwari to conclude my thoughts:
इतने ऊँचे उठो

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से सिंचित करो धरा,
समता की भाव वृष्टि से जाति भेद की,
धर्म-वेश की काले गोरे रंग-द्वेष की ज्वालाओं से जलते जग में इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥
नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो नये राग को नूतन स्वर दो भाषा को नूतन अक्षर दो युग की नयी मूर्ति-रचना में इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥
लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है तोड़ो बन्धन, रुके न चिन्तन गति,
जीवन का सत्य चिरन्तन धारा के शाश्वत प्रवाह में इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।
चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनानाअगर कहीं हो स्वर्ग,
उसे धरती पर लाना सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे सब हैं प्रतिपल साथ हमारे दो कुरूप को रूप सलोना इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥